ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Poems) • Chapter 2
कुण्डली क्या है? (What is a Kundali?):
कुण्डली हिंदी साहित्य का एक मात्रिक छंद है। इसके 6 चरण (lines) होते हैं। यह दोहा (Doha) और रोला (Rola) के मेल से बनती है। इस छंद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिस शब्द से इसकी शुरुआत होती है, उसी शब्द से इसका अंत भी होता है। कुण्डलियों में मुख्यतः नीति, ज्ञान और व्यवहार की बातें बताई जाती हैं।
शब्दार्थ: नरी = नाला/गड्ढा; दावागीर = हमलावर/दुश्मन; तिनहूँ को झारै = उन्हें भी पछाड़ दे; धूर के बाटी = धूल के रास्ते पर चलने वाले यात्री (Travelers)।
प्रसंग: इस कुण्डली में कवि ने एक साधारण सी लकड़ी की 'लाठी' (Stick) के अनेक लाभ और उपयोगिता बताते हुए उसे हमेशा अपने साथ रखने की सलाह दी है।
व्याख्या: कवि गिरधर कहते हैं कि हे यात्री! लाठी में बहुत से गुण (फायदे) होते हैं, इसलिए यात्रा करते समय इसे सदा अपने साथ रखना चाहिए। यदि रास्ते में कोई गहरी नदी या नाला आ जाए, तो लाठी की गहराई नापकर इंसान स्वयं को डूबने से बचा सकता है। यदि कोई पागल कुत्ता झपटे, तो लाठी से उसे मारकर भगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, यदि कोई शक्तिशाली दुश्मन हमला (दावागीर) कर दे, तो लाठी से अपनी रक्षा की जा सकती है और दुश्मन को पीटा जा सकता है। इसलिए हे यात्री! बाकी सारे हथियारों को छोड़ो और अपने हाथों में हमेशा एक लाठी साथ रखो।
शब्दार्थ: कमरी = छोटा काला कंबल (Blanket); वाफ्ता = रेशमी या बहुत कीमती कपड़ा; बकुचा बाँधे = गठरी (Bundle) बाँध लेना; झारि = झाड़कर; दमरी = पैसे/मूल्य; मर्यादा = इज़्ज़त।
प्रसंग: इसमें कवि ने एक सस्ते और साधारण 'काले कंबल' (कमरी) की अत्यंत उपयोगिता बताई है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि एक छोटा-सा काला कंबल (कमरी) बाज़ार में बहुत कम कीमत में मिल जाता है, लेकिन यह बहुत काम की चीज़ है। जब हम सफर में होते हैं, तो यह कमरी हमारे कीमती कपड़ों (खासा-मलमल-वाफ्ता) को धूल और वर्षा से बचाकर उनकी इज़्ज़त (मान) रखती है। यदि हमें सामान की गठरी (बकुचा) बाँधनी हो, तो यह कंबल उसमें काम आता है। और यदि रात हो जाए, तो इसे ज़मीन पर झाड़कर चादर की तरह बिछाकर आराम से सोया भी जा सकता है। इसलिए कवि कहते हैं कि यह कमरी कम पैसों में मिलती है परंतु बड़ी इज़्ज़त रखती है, इसे सदा अपने पास रखना चाहिए।
शब्दार्थ: गाहक = ग्राहक/कद्रदान; सहस नर = हज़ारों मनुष्य; लहै = प्राप्त करना/पूछना; कागा = कौआ; कोकिला = कोयल; अपावन = अपवित्र; ठाकुर मन के = मन के राजा या घमंडी लोग।
प्रसंग: इस कुण्डली में कवि ने स्पष्ट किया है कि समाज में केवल उसी व्यक्ति का सम्मान होता है जिसके पास 'गुण' (Qualities) होते हैं, बाहरी रूप-रंग का कोई मोल नहीं है।
व्याख्या: कवि गिरधर कहते हैं कि इस संसार में हज़ारों लोग ऐसे हैं जो अच्छे गुणों के ग्राहक हैं (अर्थात् गुणों की कद्र करने वाले हैं)। बिना गुणों के कोई किसी को नहीं पूछता। कवि कौए (कागा) और कोयल (कोकिला) का उदाहरण देते हैं। कौआ और कोयल दोनों का रंग और रूप एक जैसा (काला) होता है, लेकिन जब लोग उनकी आवाज़ (शब्द) सुनते हैं, तो कोयल की मीठी आवाज़ सबको सुहावनी (अच्छी) लगती है, जबकि कौए की कर्कश (कड़वी) आवाज़ के कारण वह सबको अपवित्र और बुरा लगता है। इसलिए हे अभिमानी मनुष्यों! सुन लो, बिना गुणों के समाज में किसी की इज़्ज़त (लहै) नहीं होती, दुनिया हमेशा गुणों को ही पूजती है।
प्रश्न 1: कवि ने लाठी के क्या-क्या गुण बताए हैं और उसे साथ रखने की सलाह क्यों दी है?
उत्तर: कवि गिरधर के अनुसार लाठी एक साधारण लकड़ी नहीं, बल्कि अनेक गुणों से भरपूर है। यात्रा के समय यदि रास्ते में कोई गहरी नदी या गड्ढा (नाली) आ जाए, तो लाठी से सुरक्षित रास्ता नापा जा सकता है। यदि कोई पागल कुत्ता झपटे, तो लाठी से अपनी रक्षा की जा सकती है। इसके अतिरिक्त, यदि कोई दुश्मन (दावागीर) हमला कर दे, तो लाठी एक बेहतरीन हथियार का काम करती है। इन्हीं सुरक्षा और बहु-उपयोगिता के कारणों से कवि ने सब हथियार छोड़कर लाठी को सदा अपने साथ (हाथ में) रखने की सलाह दी है।
प्रश्न 2: 'कमरी' सस्ते दामों में मिलने के बावजूद कीमती क्यों है?
उत्तर: 'कमरी' (काला कंबल) बाज़ार में भले ही बहुत कम पैसों (थोरे दमरी) में मिलती है, लेकिन इसके उपयोग बहुत हैं। सफर में यह हमारे कीमती रेशमी व मलमल के कपड़ों (वाफ्ता) को धूल और वर्षा से बचाकर इज़्ज़त रखती है। आवश्यकता पड़ने पर इसका उपयोग सामान की गठरी बाँधने के लिए किया जा सकता है। और रात के समय सफर में इसे ज़मीन पर झाड़कर चादर और बिस्तर की तरह बिछाया जा सकता है। अपनी इसी बहुउद्देशीय उपयोगिता (Multi-purpose utility) के कारण यह कमरी बहुत कीमती है।
प्रश्न 3: कोयल और कौए के उदाहरण के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहते हैं?
उत्तर: कोयल और कौए के उदाहरण के माध्यम से कवि 'स्वभाव और गुणों के महत्व' का संदेश देना चाहते हैं। कोयल और कौआ दोनों देखने में एक समान (काले रंग के) होते हैं। लेकिन समाज कोयल को प्रेम करता है और कौए को अपवित्र (अपावन) मानता है। इसका कारण उनका बाहरी रूप नहीं, बल्कि उनका 'गुण' (उन बोली) है। कोयल मीठा बोलती है, जबकि कौआ कर्कश बोलता है। इस उदाहरण से कवि सिखाते हैं कि समाज में दिखावटी रूप-रंग का कोई मोल नहीं है, व्यक्ति को सम्मान उसके अच्छे गुणों और मधुर व्यवहार से ही मिलता है ("बिन गुन लहै न कोय")।